सर्च न्यूज: सच के साथ: सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को लेकर एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से काट दिया जाता है, तो इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि उसने भारत की नागरिकता खो दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम व्यवस्था दी।
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के पास किसी की नागरिकता तय करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग का कार्यक्षेत्र केवल मतदाता सूची के प्रबंधन और नियंत्रण तक ही सीमित है। यदि SIR प्रक्रिया के दौरान किसी के नाम पर कोई आपत्ति होती है, तो चुनाव आयोग का यह कर्तव्य है कि वह नागरिकता के अंतिम निर्धारण के लिए मामले को केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास भेजे, न कि खुद कोई फैसला ले।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR प्रक्रिया के तहत करीब 34 लाख अपीलें लंबित हैं, जिसके कारण प्रभावित लोगों को राशन कार्ड (PDS), जाति प्रमाणपत्र और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। अदालत ने निर्देश दिया है कि इस डेटा को पारदर्शी बनाया जाए और नागरिकता पर अंतिम निर्णय होने तक किसी भी गरीब को सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित न किया जाए।