Two-day workshop organized by DBMS College of Education:विलुप्त होती झारखंड की लोककलाओं के संरक्षण पर दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित
सर्च न्यूज: सच के साथ: जमशेदपुर, 22 अगस्त 2026:डीबीएमएस कॉलेज ऑफ एजुकेशन के कल्चरल क्लब के तत्वावधान में अबीरा आर्ट्स के सहयोग से 21 एवं 22 अगस्त को झारखंड की विलुप्त होती लोककलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में विभिन्न महाविद्यालयों से आए लगभग 100 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
श्री सोरेन ने प्रतिभागियों को बताया कि सोरा और सोहराय कला एक-दूसरे से भिन्न हैं। सोरा कला में प्रकृति, पशु-पक्षियों एवं विभिन्न पारंपरिक प्रतीकों का चित्रण प्रमुखता से किया जाता है, जबकि सोहराय कला में मानव जीवन, विशेषकर स्त्री-पुरुष आकृतियों और सामाजिक-सांस्कृतिक भावों का चित्रण देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि समय के साथ इन लोककलाओं में अनेक परिवर्तन और नए प्रयोग हुए हैं, लेकिन हमारी मूल एवं पारंपरिक कला की पहचान को सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि लोककलाएँ केवल चित्र बनाने की विधा नहीं, बल्कि किसी समाज की स्मृति, परंपरा, प्रकृति से जुड़ाव और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति होती हैं। इन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचाना हम सभी का दायित्व है।इस अवसर पर अबीरा आर्ट्स की संस्थापक श्रीमती श्वेता सिंह भी उपस्थित रहीं। अबीरा आर्ट्स द्वारा झारखंड की पारंपरिक एवं विलुप्त होती कलाओं को संरक्षित करने, कलाकारों को प्रोत्साहित करने और नई पीढ़ी को इन कलाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया जा रहा है।दो दिवसीय कार्यशाला में प्रतिभागियों ने सोरा कला की पारंपरिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा स्वयं कलाकृतियाँ बनाकर इस कला को अनुभव किया। कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए गए।कार्यशाला के सफल आयोजन में डॉ. बी. चंद्रशेखर, श्रीमती श्रीप्रिया धर्मराजन, श्रीमती सुधा दिलीप, एडवाइजर एवं मेंटर डॉ. जूही समर्पिता, प्राचार्या डॉ. मोनिका उप्पल, वाइस-प्रिंसिपल श्रीमती पामेला घोष दत्ता तथा कल्चरल क्लब की प्रमुख श्रीमती अमृता चौधरी का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। सभी शिक्षकों ने भी कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय योगदान दिया।कार्यक्रम का संचालन रश्मि, औयोना, श्रद्धा टोपनो एवं आर्तिका ने कुशलतापूर्वक किया।
कार्यशाला का समापन झारखंड की समृद्ध लोक एवं जनजातीय कला-परंपराओं को संरक्षित करने, उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाने तथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाने के संकल्प के साथ हुआ।


