November 3, 2026

आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ जमशेदपुर में आक्रोश: दूसरे दिन भी भूख हड़ताल पर डटे कर्मचारी

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जमशेदपुर के बिष्टुपुर में वोल्टास बिल्डिंग के सामने यूनाइटेड फोरम ऑफ आईडीबीआई ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज के बैनर तले आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) के निजीकरण और विनिवेश के फैसले के विरोध में लगातार दूसरे दिन मंगलवार को भी कर्मचारियों की भूख हड़ताल और धरना-प्रदर्शन जारी रहा। केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा बैंक में अपनी कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने और प्रबंधन का नियंत्रण निजी हाथों (कनाडा के फेयरफैक्स ग्रुप) में सौंपने के फैसले से बैंककर्मी बेहद आक्रोशित हैं। प्रदर्शन में महिला और पुरुष अधिकारियों सहित बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने एकजुट होकर केंद्र सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की और सार्वजनिक क्षेत्र का स्वरूप बनाए रखने की मांग की।

आंदोलनकारी नेताओं और कर्मचारियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि जिस आईडीबीआई बैंक को उन्होंने दिन-रात मेहनत करके घाटे से उबारा, आज उसी को बेचने की तैयारी की जा रही है। गौरतलब है कि सितंबर 2018 में लगभग 31.78 प्रतिशत के सकल एनपीए (NPA) और भारी वित्तीय संकट से जूझ रहे इस बैंक को आरबीआई के प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) के दायरे में डाल दिया गया था। इसके बाद बैंककर्मियों के कड़े प्रयासों और एलआईसी के पूंजी निवेश से बैंक ने शानदार वापसी की और वित्त वर्ष 2025-26 में 9,513 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड शुद्ध लाभ दर्ज किया, जिसके बाद सकल एनपीए भी घटकर मात्र 2.32 प्रतिशत रह गया है। कर्मचारियों का तर्क है कि जब बैंक हर मोर्चे पर मजबूत प्रदर्शन कर रहा है, तो देश का पैसा किसी विदेशी या निजी कंपनी को सौंपना पूरी तरह से जनहित के खिलाफ है।

कर्मचारी संगठनों ने सरकार के इस कदम से भविष्य में पैदा होने वाले गंभीर खतरों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्हें आशंका है कि निजी प्रबंधन आने के बाद कर्मचारियों की छंटनी, सेवा शर्तों में मनमाना बदलाव, पेंशन, ग्रेच्युटी और एससी-एसटी व दिव्यांगों के लिए तय आरक्षण नीतियों को दरकिनार किया जा सकता है। इसके साथ ही वक्ताओं ने चेताया कि निजीकरण के बाद आम नागरिकों, छोटे व्यापारियों, किसानों और एमएसएमई (MSME) क्षेत्र को मिलने वाली प्राथमिकताएं खत्म हो जाएंगी, क्योंकि निजी कंपनियों का एकमात्र उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना होता है। इस देशव्यापी आंदोलन को अन्य बैंकों के संगठनों ने भी समर्थन दिया है और प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि जब तक सरकार इस विनिवेश प्रक्रिया को तत्काल रद्द नहीं करती, तब तक उनका यह लोकतांत्रिक संघर्ष और तेज किया जाएगा।

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