A tribute to Shammi Kapoor on his Birth Anniversary: हिंदी सिनेमा के पहले रॉकस्टार, जिनकी मस्ती और अदाओं ने करोड़ों दिलों पर किया राज
सर्च न्यूज: सच के साथ : नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा हैं शम्मी कपूर, ‘याहू’ की गूंज और बेमिसाल अंदाज आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदामुंबई।
शम्मी कपूर का फिल्मी सफर वर्ष 1953 में फिल्म ‘जीवन ज्योति’ से शुरू हुआ। हालांकि, शुरुआती दौर में उन्हें लगातार संघर्ष करना पड़ा और सफलता आसानी से नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी अभिनय शैली में बदलाव करते हुए एक ऐसी पहचान गढ़ी, जो उस समय के दूसरे अभिनेताओं से बिल्कुल अलग थी। वर्ष 1957 में फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ से उन्हें पहचान मिलनी शुरू हुई, जबकि ‘दिल देके देखो’ ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। इसके बाद वर्ष 1961 में आई फिल्म ‘जंगली’ ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में उनका बेफिक्र अंदाज और मशहूर पुकार ‘याहू!’ हिंदी सिनेमा के इतिहास का यादगार हिस्सा बन गई।1960 के दशक में शम्मी कपूर हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में शुमार हो गए। ‘कश्मीर की कली’, ‘प्रोफेसर’, ‘चाइना टाउन’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘एन इवनिंग इन पेरिस’, ‘जानवर’ और ‘ब्रह्मचारी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय का जादू बिखेरा।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह संगीत को केवल पर्दे पर प्रस्तुत नहीं करते थे, बल्कि अपने पूरे शरीर, चेहरे के भावों और ऊर्जा से गीतों को जीवंत बना देते थे। उनका नृत्य, हेयरस्टाइल, शरारती मुस्कान और रोमांटिक अंदाज युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। उन्हें हिंदी सिनेमा का पहला रॉकस्टार भी कहा जाता है। फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ में शानदार अभिनय के लिए उन्हें वर्ष 1969 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।शम्मी कपूर का जीवन केवल फिल्मों और शोहरत तक सीमित नहीं था। वर्ष 1955 में उन्होंने अभिनेत्री गीता बाली से विवाह किया। दोनों की जोड़ी अपने समय की चर्चित जोड़ियों में से एक थी। वर्ष 1965 में गीता बाली के असामयिक निधन ने उनके जीवन में गहरा दुख भर दिया। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन और करियर को आगे बढ़ाया। बाद के वर्षों में उन्होंने ‘विधाता’, ‘प्रेम रोग’ और ‘बेताब’ जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। अभिनय के साथ-साथ उन्हें कंप्यूटर और इंटरनेट में भी गहरी रुचि थी। उम्र के साथ भूमिकाएं बदलती रहीं, लेकिन सिनेमा के प्रति उनका प्रेम और दर्शकों के साथ उनका भावनात्मक जुड़ाव हमेशा बना रहा। वर्ष 2011 में आई फिल्म ‘रॉकस्टार’ में भी वह नजर आए, जिसमें उन्होंने अपने परिवार की अगली पीढ़ी के अभिनेता रणबीर कपूर के साथ पर्दा साझा किया।
14 अगस्त 2011 को शम्मी कपूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनका जिंदादिल व्यक्तित्व और अभिनय आज भी करोड़ों सिनेप्रेमियों की यादों में जीवित है। उन्होंने साबित किया कि किसी कलाकार की असली पहचान केवल उसकी लोकप्रियता या पुरस्कारों से नहीं, बल्कि दर्शकों के दिलों में छोड़ी गई छाप से होती है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना हिंदी सिनेमा के उस स्वर्णिम दौर को नमन करना है, जब संगीत, रोमांस और अभिनय का अनूठा संगम पर्दे पर दिखाई देता था। शम्मी कपूर भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अदाएं, उनके गीत और उनका सदाबहार अंदाज आने वाली पीढ़ियों को भी मनोरंजन और प्रेरणा देते रहेंगे। शम्मी कपूर को विनम्र श्रद्धांजलि—आपका अंदाज, आपकी मुस्कान और आपकी ‘याहू!’ की गूंज हमेशा अमर रहेगी।
