225 दिन जेल में, फिर केस हुआ रद्द… आखिर प्रबीर पुरकायस्थ को कौन लौटाएगा उनका खोया वक्त?
नई दिल्ली: क्या किसी नागरिक की आज़ादी के 225 दिन सिर्फ एक कानूनी गलती की कीमत हो सकते हैं? यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि न्यूज़क्लिक के संस्थापक और वरिष्ठ पत्रकार प्रबीर पुरकायस्थ का मामला भारतीय न्याय व्यवस्था और जांच एजेंसियों की जवाबदेही पर नई बहस छेड़ रहा है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उससे जुड़े एक अन्य मामले में दर्ज एफआईआर तथा ईडी की कार्रवाई को भी रद्द करते हुए इसे कानून के दुरुपयोग का मामला बताया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट संज्ञेय अपराध नहीं दिखता, जो इस कार्रवाई को उचित ठहरा सके।
अब बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति को महीनों तक जेल में रहना पड़े और बाद में अदालत यह पाए कि गिरफ्तारी या मामला ही कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं था, तो उसकी भरपाई कौन करेगा?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी और राज्य की जवाबदेही से जुड़ा हुआ प्रश्न है। अगर किसी निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता छिन जाती है, तो सिर्फ रिहाई ही पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। सवाल यह भी है कि मानसिक तनाव, सामाजिक नुकसान और पेशेवर क्षति की जिम्मेदारी कौन लेगा?
प्रबीर पुरकायस्थ का मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक कठिन लेकिन जरूरी प्रश्न खड़ा करता है—क्या सिर्फ अदालत से मिली राहत ही न्याय है, या फिर गलत कार्रवाई के लिए जवाबदेही और मुआवज़े की भी व्यवस्था होनी चाहिए?
225 दिनों की कैद खत्म हो गई, लेकिन इस मामले ने एक ऐसी बहस शुरू कर दी है, जो आने वाले वर्षों तक भारतीय लोकतंत्र, कानून और नागरिक अधिकारों के केंद्र में बनी रह सकती है।
