“डर के आगे झुकना नहीं, सिद्धांतों पर अडिग रहना है—मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर की दृढ़ता ने जीता देश का विश्वास”
सर्च न्यूज: सच के साथ: मुजफ्फरनगर: न्याय की कुर्सी केवल एक पद नहीं, बल्कि संविधान और जनता के विश्वास की जिम्मेदारी है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के हालिया फैसले और उनकी टिप्पणियों ने इसी जिम्मेदारी को लेकर एक गंभीर और प्रेरक संदेश दिया है।
लेकिन इस फैसले से भी ज्यादा चर्चा में आया जज दिवाकर का वह संदेश, जिसमें उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता और अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की।
अपने फैसले में उन्होंने कहा कि यदि कोई न्यायाधीश बाहुबलियों, माफिया या अपराधियों के डर से अपने न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तो इससे आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर होगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह “कायर जज” कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे और जब तक अपने सिद्धांतों पर कायम रह सकते हैं, तब तक सेवा करते रहेंगे; ऐसा संभव न होने पर इस्तीफा देना बेहतर समझेंगे।
*चार महीनों में 22 मौत की सजाओं के बाद फिर चर्चा में आए: जज रवि कुमार दिवाकर पिछले कुछ महीनों से अपने फैसलों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं। रिपोर्टों के अनुसार, मुजफ्फरनगर में पिछले चार महीनों में उन्होंने 10 मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। 7 सितंबर का फैसला इस अवधि में उनकी 23वीं मौत की सजा बना। हालांकि, मौत की सजा के मामलों में अंतिम पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा की जानी होती है। इसी बीच उनके न्यायालय से 97 लंबित आपराधिक मामलों को दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित किए जाने का मुद्दा भी सामने आया है। जज दिवाकर ने अपने फैसले में गंभीर मामलों को स्थानांतरित किए जाने की प्रक्रिया और उसके संभावित प्रभावों पर चिंता जताई तथा कहा कि ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष को भी अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
“कुर्सी बचाने से बड़ा है सिद्धांत बचाना, और डर से बड़ा है न्याय पर विश्वास।”
